Inspector Zende Honest Review: Manoj Bajpayee की Netflix क्राइम-कॉमेडी में दमदार एक्टिंग, लेकिन कहानी में कमी 🎬

Inspector Zende Review: Manoj Bajpayee और Jim Sarbh के साथ एक अनोखी पुलिस कॉमेडी थ्रिलर

Netflix पर शुक्रवार, 5 सितंबर 2025 को रिलीज़ हुई Inspector Zende एक क्राइम-कॉमेडी फिल्म है जो मध्य रेलवे पुलिस अधिकारी माधुकर जेंडे की सच्ची कहानी से प्रेरित है। इसमें Manoj Bajpayee ने Zende का किरदार निभाया है और Jim Sarbh ने ‘Swimsuit Killer’ Carl Bhojraj का मजेदार लेकिन खतरनाक रूप पेश किया है। फ़िल्म की शुरुआत में ही ‘90s की पुरानी मुंबई कॉप ड्रामा की झलक दिखती है, जो एक खास नॉस्टैल्जिया की भावना जगाता है।

कहानी और थ्रिल

फिल्म की कहानी में नज़र आता है कि कैसे Zende एक बार बंद हुए जंगल जैसा मामला फिर से जिंदा करने लगता है। Carl Bhojraj, जो जेल से भागकर वापस मुंबई आता है, उसे पकड़ना Zende की सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। Zende के पास पहले ही एक बार Carl को पकड़ने का अनुभव है, इसलिए यह मामला उनके लिए सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि एक उद्देश्य बन जाता है। इस बिल्डअप में थ्रिल है, हास्य है, लेकिन कुछ जगह कहानी धीमी भी लगती है।

अभिनय और किरदार

Manoj Bajpayee की जुबान-बूझकर की हुई सहज अभिनयशैली Zende को एक जीवंत मौजूदगी देती है। उनके डायलॉग में मराठी का उपयोग और घरेलू पैनल सामने रखना उन्हें यथार्थ के करीब लाता है। Jim Sarbh थोड़ा फ़्लर्टी और खतरनाक किरदार निभाकर अच्छी छाप छोड़ते हैं—उनका Carl Bhojraj शांत, पर धुंधला कर देने वाला है। दोनों मिलकर फिल्म को संभालते हैं, लेकिन कहानी में दम न होने की वजह से वह पूरी तरह पावरफुल नहीं बन पाता।

हास्य और थ्रिल का मिश्रण

Inspector Zende एक क्राइम-कॉमेडी थ्रिलर है, लेकिन इसका तालमेल थोड़ी गड़बड़ लग सकता है। कुछ सीन जैसे पुलिस रेड, कोर्ट-कचहरी और हास्य-अवरोध मज़ेदार होते हैं, पर कुछ जगह हास्य दृश्यों और गंभीर माहौल के बीच संतुलन खो जाता है। फिर भी, कुछ सीन ऐसे हैं जो सहज तालमेल के साथ झटका दे जाते हैं—जैसे Zende का मिल्क बूथ सीन या पत्नी से मज़ाकिया पल।

सच्ची कहानी से प्रेरणा

यह फिल्म सचमुच की घटनाओं से प्रेरित है। Madhukar Zende ने Charles Sobhraj को दोबारा पकड़ने में अहम भूमिका निभाई। पहली गिरफ्तारी 1971 में मुंबई में और दूसरी 1986 में गोवा में हुई। Carl Bhojraj यह किरदार Sobhraj का फिक्शनल रूप है, लेकिन कहानी के प्रमुख मोड़—जैसे टीहरी जेल से भागने के बाद फोन की कॉल ट्रैकिंग—सचमुच आधारित हैं।

तकनीकी पक्ष: निर्देशकीय प्रयास

देbut निर्देशक Chinmay Mandlekar ने फिल्म में एक “पलप फिक्शन जैसा” टच देने की कोशिश की है। कैमरा, लाइटिंग और लोकेशन 80s-90s के मुंबई का अहसास दिलाते हैं। लेकिन कहानी की गति थमने लगती है और दुसरे हिस्से में कहानी बीच में कहीं ढल जाती है। कुछ आलोचकों ने बताया कि फिल्म शुरुआत में मज़ेदार थी, पर आगे कुछ मजबूत नहीं बना पाई।

दर्शकों और आलोचकों की प्रतिक्रिया

IMDb यूज़र्स ने कहा कि फ़िल्म लंबी नहीं है और असल कहानी-आधारित है तो एक बार देख सकते हैं। NDTV ने Manoj Bajpayee और Jim Sarbh की जोड़ी को और फिल्म के हल्के स्वभाव को पॉज़िटिव बताया। फिर भी कई ने लिखा कि कुछ सीन मज़ेदार हैं, लेकिन पूरी कहानी मज़बूत नहीं है। फर्स्टपोस्ट जीसी ने इसे बच्चों और परिवार के लिए भी देख सकते इतने हल्के ड्रामा में डाला है।

  • जीवनी आधारित कहानी, लेकिन हास्य-थ्रिलर के साथ संतुलन मुश्किल।
  • Manoj Bajpayee और Jim Sarbh की जबरदस्त झलक, निभाने की शैली प्रभावित करती है।
  • 90s मुंबई का माहौल—कैमरा और सेट डिज़ाइन ने महसूस कराया।
  • कॉमेडी और गंभीर मिक्स, कई बार अच्छे हैं लेकिन कई पल खिंचाव महसूस कराते हैं।
  • सच्ची पुलिस कार्रवाई पर आधारित, जैसे जेल से फरार, फोन ट्रेसिंग।
  • कुछ सीन यादगार हैं, बाकी कहानी कमजोर है।

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